भिंड जिले के चौम्हो के रहने वाले पूरन सिंह भदौरिया। उम्र 45 साल। सालों से गुड़गांव (हरियाणा) में स्थित हल्दीराम की फैक्टरी में नौकरी कर रहे हैं। लेकिन अचानक कोरोना को लेकर देश में हुए लॉक डाउन में उनकी फैक्टरी भी बंद हो गई। इधर गुड़गांव में जिस मकान में परिवार के साथ वे किराए पर रहते थे उसने भी कमरा खाली करवा लिया, गांव आने के लिए कोई बस, ट्रेन नहीं चल रही थी।
मजबूरन 26 अप्रैल, गुरुवार की शाम वे अपनी पत्नी सोना (40) दो बेटियां रीना (14), पूजा (9) के साथ पैदल ही अपने गृहगांव के लिए निकल पड़े। 48 घंटे में उन्होंने करीब 319 किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया। इस दौरान पैरों में छाले पड़ गए, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए कदम बढ़ाते रहे। इस दौरान बेटियों को बुखार भी आ गया, पर उनके लिए दवा तो दूर कुछ खाने के लिए भी नहीं था। जैसे-तैसे 28 अप्रैल, शनिवार की शाम वे वाह जैतपुर हाईवे स्थित जाजऊ गांव पहुंचे। जहां एक रिश्तेदार के यहां पहुंचे। उन्होंने भर पेट खाना खिलाया तो नींद आ गई। रात वहीं गुजारी और रविवार का सूरज उगते ही फिर अपने गांव की ओर चल पड़े। उनका ये सफर अभी जारी है। यह कहानी अकेले पूरन सिंह की नहीं बल्कि ऐसे कई लोगों की है जो अपने घर तक पहुंचने के लिए रास्तों में संघर्ष कर रहे हैं।